UN से अमेरिका की दूरी: क्या ‘America First’ अब दुनिया के लिए खतरे की घंटी बन गया है?
संयुक्त राष्ट्र की 31 संस्थाओं और 35 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका के बाहर निकलने के फैसले ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। जिस अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक व्यवस्था की नींव रखी थी, वही आज उससे पीछे हटता नजर आ रहा है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘America First’ नीति अब क्या दुनिया को ‘America Alone’ की ओर धकेल रही है—यह सवाल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तेजी से उठ रहा है।
सिर्फ फैसला नहीं, वैश्विक झटका
अमेरिकी मामलों के विशेषज्ञ डॉ. मोनीश तौरंगबाम के मुताबिक, यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि रणनीतिक है। उन्होंने कहा कि ट्रंप की नीतियों को देखते हुए यह कदम भले ही चौंकाने वाला लगे, लेकिन पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं है। इसका सीधा असर वैश्विक सहयोग, अंतरराष्ट्रीय भरोसे और अमेरिकी नेतृत्व की साख पर पड़ेगा।
पहले से संकट में थी वैश्विक व्यवस्था
रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा संघर्ष और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने पहले ही संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में अमेरिका का इन संस्थाओं से दूरी बनाना वैश्विक अस्थिरता को और बढ़ा सकता है। डॉ. तौरंगबाम के अनुसार, पोस्ट-वर्ल्ड वॉर-II की स्थिर वैश्विक व्यवस्था अब तेजी से कमजोर पड़ रही है।
क्या UN अमेरिका के बिना टिक पाएगा?
अमेरिका लंबे समय तक संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा फंडर रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि अमेरिकी फंडिंग और भागीदारी के बिना UN की कई एजेंसियां कैसे काम करेंगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर दो स्तरों पर दिखेगा—
- मैक्रो स्तर पर: वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव
- माइक्रो स्तर पर: विकासशील देशों में चल रही जमीनी परियोजनाओं पर गहरा असर
जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन और आदिवासी समुदायों से जुड़ी कई योजनाएं सीधे प्रभावित हो सकती हैं, जिसकी कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ेगी।
क्या अमेरिका छोड़ रहा है वैश्विक नेतृत्व?
इस सवाल पर डॉ. तौरंगबाम का कहना है कि दुनिया अब ‘Naked Realism’ के दौर में है, जहां राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर रखे जा रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि वैश्विक नेतृत्व केवल आर्थिक या सैन्य ताकत से तय नहीं होता, बल्कि इसके लिए क्षमता, इरादा और अंतरराष्ट्रीय वैधता जरूरी होती है।
चीन, BRICS और यूरोप की बढ़ती भूमिका
अमेरिका के पीछे हटने से चीन, यूरोपीय संघ और BRICS जैसे मंचों की भूमिका पर चर्चा तेज हो गई है। चीन के पास संसाधन और सैन्य ताकत जरूर है, लेकिन उसकी वैश्विक स्वीकार्यता अभी भी सवालों में है। यूरोपीय संघ एक मजबूत समूह है, लेकिन आंतरिक मतभेद उसकी सबसे बड़ी चुनौती हैं। वहीं, BRICS धीरे-धीरे वैश्विक शासन के मुद्दों पर सक्रिय हो रहा है। 2026 में भारत की BRICS अध्यक्षता को इस लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
मल्टीपोलर दुनिया या बढ़ती अराजकता?
विशेषज्ञ मानते हैं कि दुनिया एक मल्टीपोलर व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, लेकिन यह व्यवस्था स्थिर होगी या और ज्यादा अस्थिर—यह अभी साफ नहीं है। अमेरिका का बहुपक्षीय संस्थानों से हटना Multilateralism को कमजोर कर रहा है, जिससे वैश्विक अराजकता का खतरा बढ़ सकता है।
बढ़ता रक्षा बजट और असली सवाल
ट्रंप द्वारा 2027 के लिए 1.5 ट्रिलियन डॉलर के रक्षा बजट का प्रस्ताव अमेरिका की सैन्य प्राथमिकताओं को दिखाता है। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक असली सवाल बजट का नहीं, बल्कि उस ताकत के इस्तेमाल का है—क्या यह शक्ति वैश्विक स्थिरता बनाएगी या तनाव को और बढ़ाएगी?
दुनिया बदल चुकी है
अमेरिका का संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से पीछे हटना सिर्फ एक देश का फैसला नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की दिशा तय करने वाला कदम है। आने वाले वर्षों में यह साफ होगा कि वैश्विक नेतृत्व की कमान किसके हाथ में जाती है, लेकिन एक बात तय है—दुनिया अब पहले जैसी नहीं रही।