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UGC के नए 2026 नियमों के खिलाफ देशभर में उठती आवाज़

नई दिल्ली / लखनऊ / बरेली: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किए गए UGC के नए ‘इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ अब शिक्षा सुधार से ज़्यादा शिक्षा पर नियंत्रण का प्रतीक बनते जा रहे हैं। जिन नियमों को समानता और न्याय के नाम पर लागू किया गया, वही आज छात्रों और शिक्षकों के बीच डर, असमंजस और असंतोष पैदा कर रहे हैं। UGC का दावा है कि ये नियम कैंपस में भेदभाव खत्म करेंगे, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि विश्वविद्यालयों को अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि शिकायत केंद्र में बदला जा रहा है।

24 घंटे में इंसाफ या बिना सुनवाई सज़ा?

नए नियमों के तहत किसी भी शिकायत पर 24 से 48 घंटे में कार्रवाई अनिवार्य कर दी गई है। सवाल यह है कि

  • क्या बिना पूरी जांच के न्याय संभव है?
  • क्या शिक्षक को अपना पक्ष रखने का अधिकार नहीं?

शिक्षाविदों का कहना है कि यह व्यवस्था प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है, जहाँ पहले सज़ा और बाद में जांच की स्थिति बन रही है।

 विश्वविद्यालय या निगरानी तंत्र?

हर संस्थान में:

  • इक्विटी कमेटी
  • इक्विटी स्क्वाड
  • एम्बेसडर
  • 24×7 हेल्पलाइन

अब सवाल उठता है कि क्या विश्वविद्यालयों का काम शिक्षा देना है या निगरानी करना? छोटे और ग्रामीण कॉलेज पहले ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में यह नया प्रशासनिक बोझ उन्हें शैक्षणिक पतन की ओर धकेल सकता है।

 शिक्षक खामोश, कक्षा में डर

नियमों के बाद कई शिक्षक खुलकर बोलने से डर रहे हैं। विवादित विषयों पर चर्चा, निष्पक्ष मूल्यांकन और अनुशासनात्मक कार्रवाई अब जोखिम भरा कदम बनता जा रहा है।

एक प्रोफेसर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा— “अब पढ़ाने से पहले नहीं, शिकायत से पहले डर लगता है।”

समानता के नाम पर अस्पष्ट कानून

“अप्रत्यक्ष भेदभाव”, “शत्रुतापूर्ण वातावरण” जैसे शब्द स्पष्ट परिभाषा के बिना कानून का हिस्सा बना दिए गए हैं। इससे हर संस्थान में नियमों की मनमानी व्याख्या का रास्ता खुल गया है।

आंदोलन क्यों?

देश के कई हिस्सों में छात्र और शिक्षक सड़कों पर हैं।

यह आंदोलन समानता के खिलाफ नहीं, बल्कि

  • मनमाने कानून
  • डर की संस्कृति
  • शिक्षा के राजनीतिकरण के खिलाफ है।

सवाल अब भी ज़िंदा हैं

  • क्या न्याय डर से आएगा?
  • क्या शिक्षा निगरानी में पनपेगी?
  • क्या आवाज़ उठाना अब अपराध बन जाएगा?

जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक यह संघर्ष थमेगा नहीं।

यह सिर्फ नियमों का विरोध नहीं है, यह शिक्षा की आत्मा को बचाने की लड़ाई है।

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