देश में वर्षों से जानलेवा बन चुकी मैनुअल सीवर सफाई और मैला ढोने की कुप्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि मैनुअल सीवर सफाई के दौरान हुई हर मौत पर 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा, चाहे वह घटना सुप्रीम कोर्ट के अक्टूबर 2023 के फैसले से पहले की ही क्यों न हो। इस आदेश ने न सिर्फ पीड़ित परिवारों को न्याय की उम्मीद दी है, बल्कि सरकारों और स्थानीय निकायों को भी आईना दिखा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: हर मौत पर लागू होगा आदेश
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी. बी. वराले की पीठ ने स्पष्ट किया है कि मैनुअल सीवर सफाई और मैनुअल स्कैवेंजिंग के कारण होने वाली मौतों के मामलों में उसका अक्टूबर 2023 का फैसला पूरी तरह लागू होगा। अदालत ने यह भी कहा कि जिन मामलों में पहले ही मुआवजा तय होकर भुगतान हो चुका है, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा। लेकिन जहां अब तक उचित मुआवजा नहीं मिला है, वहां यह फैसला सीधे तौर पर लागू होगा।
मैनुअल सीवर सफाई: कानूनन अपराध, फिर भी जारी
भारत में मैनुअल सीवर सफाई और मैला ढोने पर कानूनी रूप से प्रतिबंध है, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी सैकड़ों मजदूर बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर और सेप्टिक टैंक में उतारे जाते हैं। ज़हरीली गैस, ऑक्सीजन की कमी और गंदगी के कारण हर साल कई मजदूर अपनी जान गंवा देते हैं। इसके बावजूद जिम्मेदार एजेंसियां अक्सर इसे दुर्घटना बताकर पल्ला झाड़ लेती हैं।
10 लाख से 30 लाख तक: मुआवजे का सफर
सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में अपने ऐतिहासिक फैसले में मैनुअल सीवर सफाई से मौत पर मिलने वाले मुआवजे को 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दिया था। लेकिन इसके बाद भी अलग-अलग हाई कोर्ट ने इस पर अलग-अलग रुख अपनाया। मद्रास हाई कोर्ट ने एक मामले में 10 लाख रुपये मुआवजा तय किया वहीं दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दिया इसी असमानता को लेकर राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर किया था।
NALSA की याचिका और सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण
NALSA ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि देश के अलग-अलग हाई कोर्ट मुआवजे को लेकर अलग-अलग मानक अपना रहे हैं, जिससे पीड़ित परिवारों को समान न्याय नहीं मिल पा रहा। 20 जनवरी को दिए गए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रम को पूरी तरह समाप्त कर दिया और साफ कर दिया कि 30 लाख रुपये का मुआवजा ही अंतिम और समान मानक होगा।
एक विधवा की लड़ाई बनी नजीर
यह मामला एक ऐसी महिला की याचिका पर सामने आया, जिनके पति की 2022 में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत हो गई थी। वह मृतक सीवर सफाईकर्मी की विधवा और आश्रित हैं। महिला ने अदालत को बताया कि राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग ने अगस्त 2023 में मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन इसके बावजूद आज तक उन्हें एक पैसा नहीं मिला।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में न सिर्फ मुआवजा बढ़ाकर 30 लाख रुपये देने का आदेश दिया, बल्कि यह भी कहा कि— “अक्टूबर 2023 से पहले हुई मौतों पर भी यही आदेश लागू होगा।” इस एक पंक्ति ने हजारों पीड़ित परिवारों के लिए इंसाफ के दरवाजे खोल दिए हैं।
क्यों यह फैसला बनेगा नजीर?
यह फैसला इसलिए ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि—
- यह पीछे की तारीख से भी लागू होगा
- सभी राज्यों और अदालतों के लिए एक समान मानक तय करता है
- प्रशासनिक लापरवाही पर सीधी जवाबदेही तय करता है
- पीड़ित परिवारों को सम्मानजनक मुआवजा सुनिश्चित करता है
- अब कोई भी राज्य या निकाय कम मुआवजा देकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकेगा।
प्रशासन और नगर निकायों पर बढ़ेगा दबाव
इस आदेश के बाद नगर निगमों, पंचायतों और ठेका एजेंसियों पर भारी दबाव बढ़ने वाला है। अब सीवर सफाई के दौरान होने वाली किसी भी मौत को हल्के में नहीं लिया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे मशीनों के इस्तेमाल और सुरक्षा मानकों को अपनाने की मजबूरी बढ़ेगी।
समाज के लिए बड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं है। यह समाज को यह संदेश देता है कि— “कोई भी काम इंसान की जान से बड़ा नहीं है।” मैनुअल सीवर सफाई जैसी अमानवीय प्रथा को खत्म करना सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी है| मैनुअल सीवर सफाई से मौत पर 30 लाख रुपये मुआवजा देने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश पीड़ित परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है। यह फैसला न सिर्फ न्यायिक सख्ती दिखाता है, बल्कि एक सभ्य समाज की पहचान भी बनता है। अब देखना यह है कि राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय इस फैसले को कितनी ईमानदारी से जमीन पर उतारते हैं।