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लखनऊ/अयोध्या। सरकारी सेवा में रहते हुए भावनाओं को अक्सर दबा दिया जाता है, लेकिन जब स्वाभिमान आहत हो जाए तो आंसू भी सवाल बन जाते हैं। अयोध्या में तैनात GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह का इस्तीफा और उसके बाद पत्नी से फोन पर बात करते हुए उनका फफक-फफक कर रोना पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। यह सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि सिस्टम, विचारधारा और आत्मसम्मान के बीच की गहरी पीड़ा की कहानी है।

अयोध्या के GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह इन दिनों देशभर की मीडिया और सोशल मीडिया पर सुर्खियों में हैं। वजह है उनका इस्तीफा और उससे जुड़ा एक भावुक वीडियो, जिसने लाखों लोगों की आंखें नम कर दीं। इस वीडियो में वे फोन पर अपनी पत्नी से बात करते हुए फूट-फूट कर रोते नजर आते हैं और बार-बार कहते हैं— “मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ… मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ।” यह वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, लोगों के बीच कई सवाल उठने लगे—क्या एक ईमानदार अफसर सिस्टम से हार गया? क्या विचारधारा की कीमत सरकारी कुर्सी से ज्यादा भारी पड़ गई? या फिर यह एक अधिकारी का आत्मसम्मान था, जिसने उन्हें यह कठोर फैसला लेने पर मजबूर कर दिया?

वायरल वीडियो ने क्यों झकझोर दिया देश को?

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि प्रशांत कुमार सिंह बेहद भावुक हालत में फोन मिलाते हैं। जैसे ही उनकी पत्नी फोन उठाती हैं, वे कहते हैं—

“मैंने इस्तीफा दे दिया है… मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ…” इतना कहते ही उनकी आवाज भर्रा जाती है और वे रो पड़ते हैं।

फोन काटने के बाद वे वहां मौजूद लोगों से कहते हैं—

“सॉरी… मैं पत्नी से बात कर रहा था। मेरी दो बेटियां हैं, मैं दो रात से सोया नहीं हूं। बहुत पीड़ा में था।”

यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने के लिए काफी है। एक जिम्मेदार पद पर बैठा अधिकारी, जो हमेशा संयम और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है, जब इस तरह टूटता है, तो मामला सिर्फ नौकरी छोड़ने का नहीं रह जाता।

पीएम मोदी और सीएम योगी के समर्थन में इस्तीफा

प्रशांत कुमार सिंह ने अपने इस्तीफे को लेकर साफ कहा है कि यह फैसला उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में लिया है। उनका कहना है कि वे अपने नेतृत्व का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते।

उन्होंने कहा—
“जिसका नमक खाते हैं, उसका सिला भी अदा करना होता है। मैं अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं कर सकता था।”

यह बयान अपने आप में बताता है कि यह इस्तीफा किसी दबाव या मजबूरी का नतीजा नहीं, बल्कि एक वैचारिक और नैतिक फैसला था।

क्या किसी का दबाव था?

इस पूरे मामले में कई तरह की अटकलें भी लगाई गईं, लेकिन प्रशांत कुमार सिंह ने साफ शब्दों में कहा कि उन पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था। न ही किसी राजनीतिक दल और न ही किसी अधिकारी ने उन्हें इस्तीफा देने को मजबूर किया।

उनके मुताबिक, यह फैसला पूरी तरह से उनका निजी था—
“यह मेरा स्वाभिमान था, मेरी सोच थी और उसी के आधार पर मैंने यह निर्णय लिया।”

कौन हैं प्रशांत कुमार सिंह?

प्रशांत कुमार सिंह का जन्म 28 अक्टूबर 1978 को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा जीवन राम इंटर कॉलेज से प्राप्त की और इसके बाद वाराणसी के उदय प्रताप महाविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने वर्ष 2013 में राज्यकर विभाग (GST) में अपनी सेवा की शुरुआत की। उनकी पहली पोस्टिंग सहारनपुर में हुई थी। वर्ष 2023 में उन्हें अयोध्या संभाग में राज्यकर विभाग के संभागीय उप आयुक्त (डिप्टी कमिश्नर) के रूप में तैनात किया गया। उनकी छवि एक कर्मठ, ईमानदार और अनुशासित अधिकारी की रही है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक वे अपने काम को लेकर हमेशा गंभीर और संवेदनशील रहे हैं।

इस्तीफे के बाद क्या करेंगे?

इस्तीफा देने के बाद प्रशांत कुमार सिंह ने यह भी ऐलान किया है कि यदि उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाता है, तो वे अपने निजी संसाधनों से समाज सेवा के कार्यों में जुटेंगे। उनका कहना है कि सेवा सिर्फ सरकारी पद पर रहकर ही नहीं की जाती, बल्कि समाज के बीच रहकर भी बदलाव लाया जा सकता है।

सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रिया

प्रशांत कुमार सिंह के वीडियो पर सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंटा नजर आ रहा है।
एक वर्ग उन्हें ईमानदारी, स्वाभिमान और विचारधारा का प्रतीक बता रहा है, तो वहीं दूसरा वर्ग इसे भावनात्मक फैसला मान रहा है। हालांकि, ज्यादातर लोग इस बात पर सहमत हैं कि जिस तरह एक अधिकारी खुलेआम अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहा है, वह आज के दौर में दुर्लभ है।

एक इस्तीफा, कई सवाल

प्रशांत कुमार सिंह का इस्तीफा सिर्फ एक प्रशासनिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस अंदरूनी संघर्ष की झलक देता है, जो सिस्टम के भीतर काम कर रहे कई ईमानदार लोगों के मन में चलता रहता है।यह कहानी सत्ता, सेवा, स्वाभिमान और संवेदनाओं के टकराव की है—जहां एक कुर्सी से ज्यादा भारी इंसान का आत्मसम्मान साबित हुआ।

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