अमेरिका और रूस के बीच पहले से जारी भू-राजनीतिक तनाव अब समुद्र तक पहुंच गया है। नॉर्थ अटलांटिक में रूसी झंडे वाले एक तेल टैंकर को अमेरिका द्वारा जब्त किए जाने के बाद मॉस्को ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। रूस ने इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का उल्लंघन बताते हुए चेतावनी दी है कि इस कदम से वैश्विक स्तर पर सैन्य और राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है, साथ ही यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की कोशिशों पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
अमेरिका-रूस टकराव में नया अध्याय, समंदर बना संघर्ष का मैदान
दुनिया की दो सबसे बड़ी सैन्य शक्तियों अमेरिका और रूस के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। अमेरिका द्वारा नॉर्थ अटलांटिक में रूसी झंडे वाले एक तेल टैंकर को जब्त किए जाने के बाद मॉस्को ने इसे “खुली आक्रामकता” करार दिया है। इस घटना ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों में नई कड़वाहट घोल दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और वैश्विक सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रूसी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिकी कार्रवाई यूरो-अटलांटिक क्षेत्र में सैन्य और राजनीतिक तनाव को और भड़का सकती है। मंत्रालय के अनुसार, यह घटना ऐसे समय में हुई है जब यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयास चल रहे हैं और किसी भी तरह की उकसावे वाली कार्रवाई शांति प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकती है।
अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का आरोप
मॉस्को का दावा है कि जिस तेल टैंकर को जब्त किया गया, उसके पास दिसंबर में जारी किया गया वैध रूसी झंडे के तहत संचालन का परमिट था। रूस का कहना है कि खुले समुद्र में इस तरह की जब्ती अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का घोर उल्लंघन है। रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए एकतरफा प्रतिबंध अवैध हैं और उनके आधार पर किसी स्वतंत्र व्यापारी जहाज को जब्त करना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। रूस ने चेतावनी दी कि इस तरह की कार्रवाइयों से वैश्विक समुद्री व्यापार की सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो सकता है।
पुतिन की चुप्पी, लेकिन संकेत स्पष्ट
इस पूरे घटनाक्रम पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ओर से अब तक कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं आई है। पुतिन की यह चुप्पी कूटनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। इससे पहले भी पुतिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जुड़े कई संवेदनशील मुद्दों पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से बचते रहे हैं। हालांकि, रूसी राजनयिकों ने खुलकर अमेरिका पर निशाना साधा है और इसे रूस की संप्रभुता और प्रतिष्ठा को चुनौती देने वाला कदम बताया है।
अमेरिका का पक्ष: प्रतिबंधों का उल्लंघन
अमेरिकी यूरोपीय कमांड के अनुसार, जिस व्यापारी जहाज को जब्त किया गया, उसका नाम पहले “बेला 1” था, जिसे बाद में बदलकर “मरीनरा” कर दिया गया और उस पर रूसी झंडा लगा दिया गया। अमेरिका का दावा है कि यह जहाज अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए वेनेजुएला से जुड़े तेल व्यापार में शामिल था। ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला पर कड़े तेल प्रतिबंध लगाए हुए हैं। अमेरिकी ऊर्जा विभाग का कहना है कि वेनेजुएला से तेल का आयात-निर्यात केवल उन्हीं चैनलों से हो सकता है जो अमेरिकी कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के अनुरूप हों।
रूस के विकल्प सीमित?
अमेरिका के पूर्व वरिष्ठ राजनयिक और यूरोपीय मामलों के विशेषज्ञ डैनियल फ्राइड का कहना है कि इस मामले में रूस के पास कड़े बयानों के अलावा बहुत सीमित विकल्प हैं। उनके अनुसार, रूस की प्रतिक्रिया मुख्य रूप से बयानबाजी तक सीमित रहेगी। फ्राइड ने कहा, “जब रूस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी महसूस होती है, तो वह तीखी प्रतिक्रिया देता है। लेकिन इस मामले में सच्चाई यह है कि रूस इस जहाज को लेकर कुछ भी ठोस नहीं कर सका।”
यूक्रेन युद्ध ने कमजोर की रूस की स्थिति
विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध के कारण रूस की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पहले से ही कमजोर हो चुकी है। आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य खर्च और कूटनीतिक अलगाव ने रूस की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है।
डैनियल फ्राइड के अनुसार, “जब अंतरराष्ट्रीय कानून की बात आती है, तो यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस की शिकायतें बहुत प्रभावी नहीं रह गई हैं। रणनीतिक रूप से रूस फैला हुआ और कमजोर दिखाई देता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि भले ही रूस अमेरिकी हितों को निशाना बनाकर जवाब दे सकता था, लेकिन पुतिन शायद अमेरिका के साथ सीधे टकराव का जोखिम नहीं उठाना चाहेंगे।
क्या बढ़ेगा वैश्विक तनाव?
इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका और रूस के बीच संघर्ष केवल जमीन या आसमान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब समुद्री मार्ग भी इसके दायरे में आ गए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसे कदमों की पुनरावृत्ति हुई, तो यह वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि रूस इस घटना के बाद आगे क्या कदम उठाता है और क्या अमेरिका इस मुद्दे पर कोई कूटनीतिक रास्ता अपनाने को तैयार होगा।