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उत्तर प्रदेश के संभल जिले से सामने आई यह घटना प्रशासनिक सख्ती, कानूनी प्रक्रिया और सामाजिक संतुलन—तीनों के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है। सलेमपुर सालार उर्फ हाजीपुर गांव में सरकारी जमीन पर बनी मदीना मस्जिद को लेकर वर्षों से चल रहा विवाद आखिरकार एक अप्रत्याशित मोड़ पर खत्म हुआ, जब प्रशासन की तय कार्रवाई से पहले ही मस्जिद कमेटी और स्थानीय लोगों ने खुद ही अवैध ढांचे को गिरा दिया। यह मामला केवल एक अवैध निर्माण का नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक दबाव का भी प्रतीक बन गया है, जो उत्तर प्रदेश में जारी ‘बुलडोजर कार्रवाई’ के चलते अतिक्रमणकारियों के बीच देखा जा रहा है।

4 जनवरी की सुबह से पहले ही बदल गया पूरा दृश्य

प्रशासन की ओर से 4 जनवरी 2026 की सुबह 10 बजे बड़े स्तर पर ध्वस्तीकरण अभियान तय था। योजना के अनुसार तहसीलदार के नेतृत्व में 31 राजस्व अधिकारियों की टीम, पांच थानों की पुलिस फोर्स, पीएसी और आरआरएफ की कंपनी के साथ मौके पर पहुंचने वाली थी। तीन बुलडोजर विशेष रूप से इस कार्रवाई के लिए तैयार रखे गए थे। लेकिन जब प्रशासनिक अमला सुबह मौके पर पहुंचा, तो वहां न तो मस्जिद खड़ी थी और न ही किसी तरह का विरोध। 439 वर्ग मीटर में फैला पूरा ढांचा पहले ही मलबे में तब्दील हो चुका था।

आधी रात हथौड़ों से गिराई गई मस्जिद

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, 4 जनवरी की रात 12 बजे के बाद मस्जिद कमेटी और कुछ ग्रामीणों ने आपसी सहमति से खुद ही अवैध निर्माण गिराने का फैसला किया। हथौड़े, फावड़े और अन्य औजारों की मदद से रात भर काम चला और सुबह होने तक मदीना मस्जिद पूरी तरह ध्वस्त कर दी गई। इस कदम को स्थानीय लोग “टकराव से बचने की कोशिश” के रूप में देख रहे हैं, जबकि प्रशासन इसे कानून के प्रति जागरूकता का परिणाम मान रहा है।

2018 से चल रहा था कानूनी विवाद

इस पूरे मामले की नींव साल 2018 में पड़ी थी। तहसीलदार धीरेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक, मस्जिद के मुतवल्ली हाजी शमीम पर सरकारी भूमि पर 439 वर्ग मीटर में अवैध निर्माण कराने का आरोप था।
14 जून 2018 को पहली बार इस संबंध में रिपोर्ट दर्ज की गई, जिसके बाद मामला तहसीलदार न्यायालय पहुंचा। राजस्व अभिलेखों, नक्शों और साक्ष्यों की गहन जांच के बाद अदालत ने भूमि को सरकारी घोषित किया और अवैध निर्माण हटाने के साथ मुतवल्ली को बेदखल करने का आदेश दिया।

प्रशासन की सख्ती और ‘बुलडोजर भय’

पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में अवैध कब्जों के खिलाफ चलाए गए बुलडोजर अभियानों ने एक स्पष्ट संदेश दिया है—सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि इसी सख्ती और संभावित टकराव के डर ने मस्जिद कमेटी को खुद कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया। यदि प्रशासन बुलडोजर चलाता, तो कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता था।

तहसीलदार का बयान: “यह सकारात्मक कदम”

मौके पर पहुंचने के बाद तहसीलदार धीरेंद्र प्रताप सिंह ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा,
“अगर लोग खुद ही अवैध कब्जा हटा रहे हैं, तो यह एक अच्छी और सकारात्मक पहल है। प्रशासन का उद्देश्य सिर्फ सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराना है, किसी प्रकार का विवाद खड़ा करना नहीं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून का पालन सभी के लिए समान है और किसी भी धार्मिक या सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता।

स्थानीय स्तर पर बनी मिसाल

संभल की यह घटना अब आसपास के इलाकों में चर्चा का विषय बन गई है। कई लोग इसे प्रशासनिक सख्ती की जीत मान रहे हैं, तो कुछ इसे सामाजिक समझदारी का उदाहरण बता रहे हैं, जहां टकराव और तनाव से बचने के लिए खुद ही अवैध निर्माण हटा दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे मामलों में कानून का पालन शांतिपूर्ण ढंग से हो, तो प्रशासन और समाज—दोनों के लिए यह बेहतर स्थिति होती है।

सवाल भी उठे, संदेश भी गया

  • हालांकि इस घटना ने कुछ सवाल भी खड़े किए हैं—
  • क्या ‘बुलडोजर का डर’ कानून से ज्यादा प्रभावी हो गया है?
  • क्या लोग अब न्यायिक प्रक्रिया के बजाय दबाव में फैसले ले रहे हैं?

लेकिन प्रशासन का तर्क साफ है—कानून का आदेश था और उसका पालन हुआ, चाहे वह प्रशासन करे या स्वयं संबंधित पक्ष। संभल की मदीना मस्जिद का गिराया जाना केवल एक ढांचे का ढहना नहीं है, बल्कि यह बदलते प्रशासनिक तेवर, कानूनी सख्ती और सामाजिक मनोविज्ञान का प्रतिबिंब है। यह घटना भविष्य में अन्य अतिक्रमण मामलों के लिए एक संदेश और मिसाल—दोनों बन सकती है।

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