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तेलंगाना के सरकारी स्कूलों में बच्चों को पोषण देने के उद्देश्य से चलाई जा रही मिड-डे मील योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। कोनिजेरला मंडल के बोडियाथांडा सरकारी प्राइमरी स्कूल में मिड-डे मील खाने के बाद 45 बच्चों की तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिनमें से 38 छात्रों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और 10 बच्चों की हालत गंभीर बताई जा रही है। इस दर्दनाक घटना ने प्रशासनिक लापरवाही और बच्चों की सेहत से हो रहे खिलवाड़ को उजागर कर दिया है।

तेलंगाना के कोनिजेरला मंडल से सामने आई यह घटना न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था बल्कि सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। बोडियाथांडा स्थित सरकारी प्राइमरी स्कूल में शुक्रवार को मिड-डे मील खाने के बाद अचानक बच्चों की तबीयत बिगड़ने लगी। देखते ही देखते स्कूल परिसर में अफरा-तफरी मच गई।

मिड-डे मील खाते ही बिगड़ी हालत

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दोपहर के भोजन के कुछ ही देर बाद छात्रों में उल्टी, दस्त, पेट दर्द और चक्कर आने जैसे लक्षण दिखने लगे। शुरुआत में शिक्षकों को लगा कि शायद किसी एक बच्चे को तबीयत खराब हुई है, लेकिन कुछ ही मिनटों में कई बच्चे एक-एक कर बीमार पड़ने लगे। स्कूल में मौजूद शिक्षकों और स्टाफ ने तुरंत गांव वालों और अभिभावकों को सूचना दी। जब स्थिति गंभीर होती नजर आई, तो सभी बीमार बच्चों को आनन-फानन में खम्मम के सरकारी अस्पताल पहुंचाया गया।

38 छात्र अस्पताल में भर्ती, 10 की हालत गंभीर

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, कुल 45 बच्चे बीमार पड़े थे, जिनमें से 38 को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। डॉक्टरों ने बताया कि 10 छात्रों की हालत गंभीर बनी हुई है और उन्हें विशेष निगरानी में रखा गया है। बच्चों को फूड प्वाइजनिंग के लक्षण पाए गए हैं। अस्पताल में भर्ती बच्चों के माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। कई अभिभावकों ने प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

एक दिन पहले भी सामने आया था ऐसा मामला

चौंकाने वाली बात यह है कि यह घटना संगारेड्डी जिले में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में मिड-डे मील खाने से 45 छात्रों के बीमार पड़ने की घटना के ठीक एक दिन बाद सामने आई है। लगातार दो जिलों से इस तरह की खबरों ने पूरे राज्य में हड़कंप मचा दिया है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर बच्चों को परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता की जांच कौन करता है? क्या प्रशासन केवल कागजों में ही निगरानी कर रहा है?

क्या होता है मिड-डे मील?

मिड-डे मील योजना केंद्र और राज्य सरकार की एक महत्वपूर्ण सामाजिक योजना है, जिसके तहत सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को दोपहर का मुफ्त भोजन दिया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चों में कुपोषण को दूर करना, भूख कम करना और शिक्षा के प्रति रुचि बढ़ाना है। इस योजना के तहत बच्चों को पौष्टिक और ताजा भोजन दिया जाना अनिवार्य है, जिसमें कैलोरी, प्रोटीन और विटामिन की न्यूनतम मात्रा तय होती है। खासकर गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों के लिए यह योजना बेहद अहम मानी जाती है।

सामाजिक समानता की योजना, लेकिन लापरवाही भारी

मिड-डे मील योजना का एक बड़ा उद्देश्य सामाजिक समानता को बढ़ावा देना भी है, जहां सभी बच्चे बिना किसी भेदभाव के एक साथ बैठकर खाना खाते हैं। इससे जाति और वर्ग के अंतर को कम करने में मदद मिलती है और लड़कियों की शिक्षा को भी प्रोत्साहन मिलता है। लेकिन जब यही भोजन बच्चों के लिए ज़हर बन जाए, तो योजना की सफलता पर गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं।

साफ-सफाई और गुणवत्ता पर सवाल

इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या खाना बनाने में साफ-सफाई का ध्यान रखा गया था? क्या भोजन की सामग्री सही और ताजा थी? क्या रसोइयों और सप्लाई सिस्टम की नियमित जांच की जाती है? विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादातर फूड प्वाइजनिंग के मामलों में भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता की अनदेखी मुख्य कारण होती है।

पहले भी हो चुके हैं ऐसे मामले

यह पहली बार नहीं है जब मिड-डे मील खाने से बच्चे बीमार पड़े हों। देश के कई राज्यों से पहले भी इस तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। बावजूद इसके, जिम्मेदार अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई न होने से लापरवाही का सिलसिला जारी है। गरीब और ग्रामीण इलाकों के बच्चे अक्सर अपनी आवाज नहीं उठा पाते, जिसका फायदा उठाकर कई बार भोजन की गुणवत्ता से समझौता किया जाता है। यह सीधे-सीधे बच्चों की जान से खिलवाड़ है।

कार्रवाई की मांग तेज

घटना के बाद गांव वालों और अभिभावकों में भारी आक्रोश है। लोग मांग कर रहे हैं कि दोषी अधिकारियों, रसोइयों और सप्लायरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही मिड-डे मील की गुणवत्ता की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। प्रशासन ने फिलहाल जांच के आदेश दे दिए हैं और भोजन के सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं। अब देखना यह होगा कि क्या इस बार सिर्फ जांच तक मामला सीमित रहेगा या वास्तव में जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी।

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