उत्तर प्रदेश की जेल व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े करती एक दर्दनाक कहानी सामने आई है। बरेली सेंट्रल जेल में बंद आजाद खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 दिसंबर 2025 को निर्दोष करार दे दिया, फिर भी वह पिछले कई हफ्तों से जेल के भीतर ही कैद है। वजह सिर्फ एक—कोर्ट के फैसले की ‘सर्टिफाइड कॉपी’ जेल तक नहीं पहुंच पाई। 24 साल जेल में बिताने के बाद भी आजाद की रिहाई एक कागज के इंतजार में अटक गई है, और बाहर उसकी मां, भाई और परिवार हर दिन उसी पल का इंतजार कर रहे हैं जब वह सच में ‘आजाद’ होकर घर लौटेगा।
नाम ‘आजाद’, लेकिन जिंदगी सलाखों के पीछे…
लखनऊ की ठंडी सुबहों से दूर, बरेली सेंट्रल जेल की ऊंची दीवारों के भीतर एक शख्स आज भी अपने नाम का मतलब ढूंढ रहा है। उसका नाम है आजाद खान… लेकिन उसकी जिंदगी आज भी कैद है। उम्र करीब 45 साल, मगर उसकी जवानी, सपने, उम्मीदें और परिवार का सुकून… सब कुछ जेल की उन्हीं दीवारों में दबकर रह गया। यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लग सकती है, लेकिन यह हकीकत है—और शायद इससे ज्यादा दर्दनाक हकीकत उत्तर प्रदेश में कम ही देखने को मिलती है।
साल 2000 की वो रात… जब एक शक ने जिंदगी छीन ली
कहानी शुरू होती है मैनपुरी जिले के छोटे से गांव व्योति कटरा से। साल था 2000। आजाद खान तब सिर्फ 21 साल का था। एक रात अचानक पुलिस गांव पहुंची और उसे उठाकर ले गई। आरोप था—डकैती। परिवार को समझ ही नहीं आया कि आखिर हुआ क्या। ना कोई पुख्ता गवाह, ना कोई ठोस सबूत… बस एक शक। और वही शक धीरे-धीरे 24 साल की कैद बन गया।
जेल में गुजरते साल… मां की आंखें सूख गईं, पिता दुनिया छोड़ गए
आजाद जेल में था और बाहर जिंदगी चलती रही… लेकिन उसके परिवार के लिए हर दिन एक सजा बन गया। समय बीतता गया, दिन हफ्तों में बदले, हफ्ते महीनों में और महीने सालों में। आजाद की मां की आंखें इंतजार करते-करते थक गईं। पिता इस दुनिया को छोड़ गए। भाई मस्तान खान मजदूरी करता रहा—कभी ईंट उठाई, कभी काम खोजा… ताकि किसी तरह जेल जाकर आजाद से मिल सके, उसे थोड़ा सहारा दे सके। हर मुलाकात में परिवार का एक ही सवाल होता—“अब कब छूटोगे?”और हर बार आजाद का जवाब एक ही—“पता नहीं…”
डर की गिरफ्त में टूट चुका था आजाद, 7 बार दिया ‘इकबालिया बयान’
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आजाद ने अदालत में सात बार इकबालिया बयान दिए। लेकिन यह कबूलनामे अपराध स्वीकार करने के नहीं थे—ये कबूलनामे एक डर का परिणाम थे। आजाद अंदर से इतना टूट चुका था कि उसे लगने लगा था—“अगर बाहर गया, तो मुझे मार दिया जाएगा।” यह वही मानसिक दबाव है, जिसे सिस्टम अक्सर “प्रक्रिया” कहकर नजरअंदाज कर देता है। और यहीं से इस केस का सबसे काला अध्याय शुरू होता है—एक निर्दोष इंसान, डर की वजह से खुद को दोषी मानने को मजबूर हो गया।
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: “ये कबूलनामे डर का नतीजा थे, अपराध का नहीं”
कई सालों की लड़ाई, अपील और सुनवाई के बाद आखिरकार न्याय की एक रोशनी दिखी। 19 दिसंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आजाद खान को निर्दोष करार दे दिया। फैसले में कोर्ट ने साफ कहा कि—अभियोजन (Prosecution) एक भी ऐसा सबूत नहीं दे सका जो आजाद को अपराध से जोड़ सके। जो कबूलनामे दिए गए, वे स्वेच्छा से नहीं बल्कि डर और दबाव में दिए गए थे। कागजों में उस दिन आजाद खान “आजाद” हो गया। लेकिन असल जिंदगी में? आज भी वह जेल में है।
निर्दोष होने के बाद भी रिहाई नहीं… वजह सिर्फ ‘एक कागज’
यह सुनकर किसी को भी हैरानी होगी कि हाईकोर्ट से बरी होने के बाद भी आजाद जेल से बाहर नहीं आ पा रहा। कारण सिर्फ एक—बरी होने के आदेश की सर्टिफाइड कॉपी (Certified Copy) अभी तक जेल तक नहीं पहुंची। यानि कानून ने तो उसे आजाद कर दिया, मगर सिस्टम की धीमी चाल ने उसे फिर भी सलाखों के पीछे रोक रखा है। एक महीना बीत गया, फिर दूसरा… लेकिन आजाद की रिहाई नहीं हुई यह “देरी” किसी फाइल की नहीं, किसी इंसान की जिंदगी की देरी है।
बाहर मां, भाई और भतीजा… हर दिन दरवाजे की तरफ देखते हैं
आजाद के घर में अब भी वही सन्नाटा है। मां हर सुबह यही सोचकर उठती है—“आज शायद मेरा बेटा आ जाएगा…”भाई मस्तान खान काम पर जाता है, लेकिन दिल जेल के उसी दरवाजे पर अटका रहता है। परिवार का हर सदस्य आजाद के लिए सिर्फ आजादी नहीं, बल्कि खोए हुए 24 सालों का जवाब चाहता है।
‘गलती’ किसकी? पुलिस, सिस्टम या प्रक्रिया…
यह मामला कई सवाल खड़े करता है: अगर सबूत नहीं था तो 24 साल जेल कैसे हो गई? “शक” के आधार पर जिंदगी बर्बाद करने का जिम्मेदार कौन है? सर्टिफाइड कॉपी न पहुंचने से रिहाई में देरी क्यों हो रही है? क्या न्याय सिर्फ फैसले तक सीमित है, या उसका असर जमीन पर भी दिखना चाहिए? आजाद खान का केस बताता है कि कई बार कोर्ट में न्याय मिलने के बाद भी इंसान को इंसाफ नहीं मिल पाता।
24 साल का हिसाब कौन देगा? खोई जवानी, टूटा परिवार, अधूरी जिंदगी
आजाद खान जब जेल गया तब 21 साल का था। आज वह 45 का हो चुका है। इस बीच उसने बाहर की दुनिया नहीं देखी— न परिवार की खुशियां, न अपने सपनों का घर, न नई जिंदगी की शुरुआत कागजों में एक निर्दोष आदमी की जीत लिख दी गई, लेकिन उसके जीवन की हार कौन लौटाएगा?
अब उम्मीद सिर्फ इतनी: ‘एक कागज’ पहुंचे और आजाद सच में आजाद हो जाए
इस पूरे मामले में सबसे दुखद बात यही है कि आजाद की रिहाई अब किसी फैसले पर नहीं, बल्कि एक दस्तावेज पर अटकी है। परिवार चाहता है कि जल्द से जल्द हाईकोर्ट का आदेश जेल प्रशासन तक पहुंचे और आजाद को रिहा किया जाए। क्योंकि अगर 24 साल बेगुनाही में बीत गए… तो अब एक दिन भी बहुत कीमती है|