भारत और अमेरिका के बीच हुआ नया व्यापार समझौता सिर्फ एक ट्रेड डील नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक ताकतों के संतुलन को बदल देने वाला बड़ा भू-राजनीतिक कदम बन गया है। इस समझौते के बाद भारत को चीन के मुकाबले करीब 50 प्रतिशत तक का सीधा लाभ मिलता दिख रहा है, जबकि बीजिंग इस डील पर खुलकर विरोध तक नहीं कर पा रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस रणनीतिक चाल ने भारत को बड़ा मौका दिया है और चीन के कई अहम सेक्टर पर संकट के बादल गहरा गए हैं।
नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही बीते 10 महीनों तक भारत को टैरिफ और सीजफायर जैसे राजनीतिक जुमलों में उलझाए रखते रहे हों, लेकिन जब भारत-अमेरिका ट्रेड डील का औपचारिक ऐलान हुआ, तो सबसे ज्यादा हक्का-बक्का चीन रह गया। इस समझौते ने न केवल भारत की स्थिति को मजबूत किया, बल्कि चीन को सीधे तौर पर आर्थिक मोर्चे पर कमजोर कर दिया है। यह डील सिर्फ टैरिफ घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव चीन की सप्लाई चेन, एक्सपोर्ट मार्केट और वैश्विक दबदबे को चुनौती देने वाले हैं।
टैरिफ में कटौती नहीं, रणनीतिक जीत
अगर सिर्फ आंकड़ों की बात करें तो भारत पर अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत रह गया है। लेकिन असली खेल इसके पीछे छिपे प्रावधानों का है। अब तक चीन, ज्यादा टैरिफ के बावजूद अमेरिका के साथ व्यापार में भारत से बेहतर स्थिति में था। लेकिन नई डील के बाद पूरा समीकरण उलट चुका है। अमेरिका ने चीन के 99 प्रतिशत निर्यात पर अब भी 37.5% से लेकर 55% तक टैरिफ लगा रखा है। इलेक्ट्रिक व्हीकल जैसे रणनीतिक सेक्टर में तो यह टैरिफ 130% तक पहुंच चुका है। ऐसे में चीन की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई है।
EV सेक्टर में भारत की एंट्री, चीन को सीधा झटका
इस ट्रेड डील का सबसे बड़ा असर इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर में देखने को मिलेगा।
डील के बाद भारत अब अमेरिकी बाजार में सस्ते और भरोसेमंद इलेक्ट्रिक व्हीकल्स बेच सकता है। यह वही सेक्टर है, जिस पर अब तक चीन का लगभग एकाधिकार रहा है। भारत की एंट्री से न सिर्फ कीमतों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, बल्कि चीन की EV इंडस्ट्री को अमेरिकी बाजार में भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। यही वजह है कि इस डील को चीन के पैरों के नीचे से जमीन खिसकने जैसा बताया जा रहा है।
MSME सेक्टर: भारत का असली हथियार
भारत के कुल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका जाता है, और इसमें करीब 60 प्रतिशत योगदान MSME सेक्टर का है। पहले 50 प्रतिशत तक के अमेरिकी टैरिफ ने इस सेक्टर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था। यह वही MSME सेक्टर है, जिस पर चीन ने दशकों से वैश्विक पकड़ बना रखी थी। अब यही सेक्टर चीन के हाथ से निकलता नजर आ रहा है।
रेयर अर्थ मैग्नेट: चीन का दबदबा कमजोर
ट्रेड डील से पहले ही अमेरिका भारत को अपनी क्रिटिकल मिनरल्स रणनीति में शामिल कर चुका था।
रेयर अर्थ मैग्नेट्स के मामले में चीन लंबे समय से दुनिया की सप्लाई चेन को नियंत्रित करता आया है। लेकिन अब भारत को वैकल्पिक सप्लायर के तौर पर तैयार किया जा रहा है वॉशिंगटन में 50 देशों की बैठक चीन की मनमानी पर लगाम भारत के पास फिलहाल केवल 3% रेयर अर्थ मैग्नेट बाजार है, लेकिन रणनीतिक समर्थन के साथ यह तेजी से बढ़ सकता है।
वैश्विक सप्लाई चेन का नया केंद्र भारत
इस ट्रेड डील के बाद भारत सिर्फ अमेरिका का व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि चीन के विकल्प के रूप में उभर रहा है।
अमेरिका अब सप्लाई चेन को चीन से हटाकर भारत जैसे भरोसेमंद लोकतांत्रिक देश की ओर शिफ्ट करना चाहता है। यही कारण है कि यह समझौता: आर्थिक नहीं, भू-राजनीतिक हथियार बन चुका है चीन खुलकर विरोध नहीं कर पा रहा वैश्विक ताकत संतुलन बदल रहा है भारत-अमेरिका ट्रेड डील ने यह साफ कर दिया है कि वैश्विक व्यापार की धुरी अब धीरे-धीरे चीन से खिसककर भारत की ओर बढ़ रही है। जहां भारत को 50 प्रतिशत तक का रणनीतिक और आर्थिक फायदा मिलता दिख रहा है, वहीं चीन के लिए आने वाला समय और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।यह डील सिर्फ आज की खबर नहीं, बल्कि आने वाले दशक की वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाला मोड़ साबित हो सकती है।